तुम और हम ।

                   ॥तुम और हम॥

तुमने हाँक लगाई, हम हुँकार बन गये।
तुमने हाथ लगाया, हम हथियार बन गए।।
                     तेरी फूँक से उठी थी चिन्गारी कभी-
                     धधक उठीं लपटें, हम अंगार बन गए।

परचम उठाए  हम साथ तुम्हारे जो चले-
तुम्हारी उम्मीदें बढ़ी-तुम उम्मीदवार बन गए।
                 मुफ्त में लेकर हमारे मतदान की ताकत-
                 उपर गए तुम, तुम अधिकार बन गए।।

सरकारी इसारे पर दुल्हन की डोली उठी-
सेहरा तुमको मिला , हम कहार बन गए।।
               हमारी गरीबी और बदनसीबी का रोना
            हम गवारों के गवाॅर, तुम होसियार बन गए।।

।। अमित फोर्बेसगंजी ।।

 

चित्र आभार :गूगल

7 thoughts on “तुम और हम ।”

  1. दोस्तों यह मेरी तीसरी कविता है पसंद आए तो अपना प्रतिक्रिया जरुर दें और अपने दोस्तों के साथ साझा जरूर करे। धन्यवाद।।

  2. बेहद उम्दा ,
    रचना का स्तर ऊचां हो रहा है ।
    आप आकाश की ऊँचायो को छुए।

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