खाली-खाली सा रहता है मन

॥ खाली-खाली सा रहता है मन ॥

खाली-खाली सा रहता है मन,
मधुर-बुंदों का संचार चाहिए ।
छल-प्रपंचो का है यह मेला,
हमे निःस्वार्थ-प्रेम से भरा संसार चाहिए।

बहुत हुआ साहब !
नही चाहिए हमे सपनें अच्छे दिनों के,
रोक सके जो गरीबी,बेरोजगारी और पलायन,सच में,
हमे ऐसा कृतसंकल्पित सरकार चाहिए ।

भारी-भारी सा रहता है तन,
स्फूर्त-रक्तों का संचार चाहिए ।
सो सकूँ मै सुनशान सड़कों पर भी,निर्भय अकेला,
ऐसा मृदुलहृदयी विहार चाहिए ।

खाली-खाली सा रहता है मन,
मधुर-बुंदों का संचार चाहिए ।
छल-प्रपंचो का है यह मेला,
हमे निःस्वार्थ-प्रेम से भरा संसार चाहिए ।
                  ॥ अमित कुमार रजक ॥

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