न हिन्दू का खून बहे, न किसी मुसलमान का खून बहे।

                  ॥ऐकता की कीमत॥ न हिन्दू का खून बहे,न किसी मुसलमान का खून बहे। भाई-भाई का खून है,न किसी इन्सान का खून बहे।। बहाना ही पड़े खून ग़र अमन चैन के वास्ते। तो हक-हिफाजत में खून हर नौ-जवान खा बहे।। सहादती हिदायत का हरदम तू ख्याल रखना। […]

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मेरी पहली कविता

!! कैसे जियूं मै इस उमर में!! जिन्दगीं की सफर में गाँव हो या शहर में जीना दुर्बल हो गया है मेरा इस उपभोक्तावादी शहर में । भोग-उपभोग ही सुख बनी है हर एक घर में सुबह-शाम हों या दोपहर में एक-एक दानें को तरसता हूँ मै परलोक जाने की इस पहर भें कैसे जियूं […]

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