चाहत है नही मेरी, किसी के राहों का काँटा बन जाना !

अपने प्रेम के खातिर, किसी के प्रीत का छिन जाना !!
दुर्दिन आऐ है मेरे, दुर्दिन आऐंगे तेरे !
गुज़ारिश है बस इतना, कर लेना तू बुधवाद सवेरे !!
तुम भी हो सफ़र में अपनी, हम भी है सफ़र में अपनी !
है  उससे  ईश्क  तुम्हे  कितना, मुझे  है देखनी !!
मै  तो  हूँ मदिर मुसाफिर, मुझे दुनियां से क्या लेना !
खोया  हूँ  ख्यालों  में तेरी, मालूम नही मुझे कहां है जाना !!
 ©अमित ‘ रजक ‘
शब्दार्थः- दुर्दिन-बुरे दिन, बुधवाद-बुद्धिबल से तर्क-कुतर्क करना,
                मदिर-मद में अलसाए हुए,
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