वे नज़रों से ओझल हो गए

    वे नज़रों से ओझल हो गए 

आज सन्नाटा पसरा है
समूचे घर में।
मम्मी बट्ट-खर्चा बाँध रही है,
लगभग सेर-भर सुखी चुड़ा,
थोड़ी-सी गूढ़ का ढेला और
दस-बारह हरी मिर्च भी,
साथ मे कुछ रोती प्याज
और उदास पड़ी नमक को भी
बाँधी जा रही है।
पापा खुश दिख रहे है,
पर पता नही क्यो?
उसका खुशी
मेरे दर्द की सागरो में अविरल
उफान पैदा कर रही है।
मै दुःखी हूँ!
मन विचलित है और 
तन भारी ।
पर सबके सामने मुझे भी
मुस्कुराना पड़रहा है ।
पता नही क्यों?
मजूरी के लिए
पापा को आज
परदेश जाना पड़ रहा है।
साथी-गण आ चूके है लेने
पापा को ।
वे जल्दी में है,
बस छूट सकती है ।
अरे! जल्दी करो भैयाऽऽ

हाँ! हाँ! बस अभी आया..

पापा बैलों से विदा ले रहे है
कुछ वर्तालाप भी कर रहे है
उनसे, पुचकारते हुए ।

ऐसा लग रहा है
मानो बैलों को भी
पापा की सभी बाते
समझ में आ रही हो आज ।

वे स्नेह से गदगद है
पापा को जाते देख
बैल भी फूट पड़े है
बांऽऽ बांऽऽ  बांऽऽ

शायद उसकी अश्रुधारा
पापा को, उसके नज़रों से
ओझल कर रहा है ।
स्तब्ध है सब के सब !
मानो जोर-जोर से रो रहें हों
हर वस्तु घर का ।

सभी को कुछ दूर तक छोड़ने
महिलाएं आई है
और साथ में कई बच्चें भी ।
सब भाव-भिभोर हो उठे है
एक साथ ।

सब आंचलों से अपने
आंसू पोछ रहे है और
बच्चें नई कुर्ता व मिठाई का
डिमांड कर चुके ।

हंसी फूट पड़ी
फिर से एक साथ ।
पर मदन अब भी रो रहे है,
मम्मी की गोद में बैठे-बैठे,
शायद वह उन्हें
नही जाने देना चाहते है….
बस आ चुकी है…
धीरे धीरे….
वे नज़रों से ओझल हो गए ।

©अमित फोर्बेसगंजी

 

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