मेरी पहली कविता

!! कैसे जियूं मै इस उमर में!!

जिन्दगीं की सफर में
गाँव हो या शहर में
जीना दुर्बल हो गया है मेरा
इस उपभोक्तावादी शहर में ।

भोग-उपभोग ही सुख बनी है
हर एक घर में
सुबह-शाम हों या दोपहर में
एक-एक दानें को तरसता हूँ मै
परलोक जाने की इस पहर भें
कैसे जियूं मै इस उमर में ।

मांसपेशियां सूख चुकी है अब
अस्तिमज्ज़ा भी सूख रही  है
ज़रा भी ऊर्जा बची नही है
अब मेरी कमर में
कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।

एक ही था जो सपूत मेरा
वह भी गुज़र गया
पूष की इस शीतलहर में
कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।

साहब की जो पुवाल पड़ी है
उसी में कटता है अब रात मेरा
मरने की इस पहर में
कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।

देख दु:ख मेरा
किसी का मन भी न है पिघलता
इस पाषाण हृदयी शहर में
कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।

पेसे से था मै रिक्शाचालक
वो भी बिक चूकी है अब
पत्नी की केंशर में
कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।

कटोरा ले पड़ा रहता हूँ अब मै
चौराहें की किसी कोने में
एक भी जो पैसा फेक दे कोई
भिखारी के इस चिथड़े झोले में

नींद भी नही आती
भूखे पेट सोने में
आँसू भी नही  निकलती
अब रोने मे ।

कर्म किया हूँ कौन सा ऐसा
ईश्वर की यह महिंमा है कैसा
क्यूं यमराज भी कतराते है
अपनी शरण ले जाने मे ।

कैसे जियूं अब मै
पचहत्तर की इस उमर में ।
         
 ©अमित फोर्बेसगंजी

चित्र आभार :गूगल

16 thoughts on “मेरी पहली कविता

  1. बहुत अच्छी और मार्मिक कविता है । बहुत खूब । प्रभु श्री हरि आपको सदा प्रगति पथ पर अग्रसर रखे ।

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